ठोसों के विधुतीय गुण

ठोसों में विधुतीय गुण, इलेक्ट्रॉनों या धन छिद्रों की गति के द्वारा अथवा आयनों की गति के द्वारा होता है। धन छिद्रों या इलेक्ट्रॉनों की गति को इलेक्ट्रॉनिक चालकता (Electrical conductivity) तथा आयनों की गति को आयनिक चालकता (Ionec conductivity) कहते है।

आयनों अथवा घनात्मक छिद्रो में चालकता इलेक्ट्रॉनिक दोश के कारण होती है। इलेक्ट्रॉनों से चालन को n- चालन तथा धन छिद्रों में से चालन को P चालन कहतें है।

शुद्ध आयनिक ठोस जहाँ चालन केवल आयनों की गति द्वारा होता है विघुत् उदासीन होते है, इनमें से गलित या विलयन अवस्था में ही विघुत् प्रवाहित हो सकती है। विघुत् चालकता के आधार पर ठोस तीन प्रकार के होते हैं-

  • सुचालक (Conductor) – इनमें विघुत्धारा का अधिकतम प्रवाह हो सकता है। इनकी चालकता 108 ओम.1 सेमी.1 कोटि की होती है। उदाहरण- धातुएँ (जैसे- Al,Cu,Ag) विघुत्-अपघट्य, (जैसे- NaCl, H2SO4)
  • कुचालक (Non-Conductor) –  इनमें प्रायोगिक रूप से विघुत् का प्रवाह नहीं होता है तथा इनकी विघुत चालकता 10-23 ओम.1 सेमी.1 कोटि की होती है। उदाहरण- अधातु में (जैसे-P,S) विघुत् अन अपघट्य (जैसे- यूरिया, सुक्रोज)
  • अर्द्धचालक (Semiconductor) – सामान्य ताप पर किसी अर्द्धचालक की विघुत् चालकता, सुचालक व कुचालक के मध्य (10-9 से 102 ओम 10.1 सेमी-1 कोटि) की होती है। पूरमशून्य ताप पर ये पूर्ण कुचालक होते है, परन्तु कमरे के ताप पर कुछ विघुत् धारा प्रवाहित कर सकते है। उदाहरण- Si, Ge आदि।
  1. अर्द्धचालकों की चालकता उनमें उपस्थित अशुद्धियों अथवा क्रिस्टल जालक में दोश के कारण होता है।
  2. ताप में वृद्धि से इनकी चालकता बढ़ती है, जबकि धातुओं की चालकता घटती है।
  3. अर्द्धचालकों के गुण, अशुद्धि की प्रकृति के आधार पर परिवर्तित होते है। अर्द्धचाजलक, ट्राँजिस्टरों में तथा प्रसारणीय मानकों में प्रकाश विघुत्ीय यंत्रो (Photoelectric devices) के रूप में प्रयुक्त होते है।
credit:Unacademy CBSE Science 11 & 12

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