Samavayavata Kise Kahate Hain, परिभाषा, प्रकार, वर्गीकरण

Samavayavata Kise Kahate Hain: समावयवता-एक ही अणु सूत्र द्वारा दो या दो से अधिक यौगिकों को प्रदर्शित किया जाये, जिनके गुण भिन्न-भिन्न होते हैं, समावयवी यौगिक कहलाते हैं

समावयवता की परिभाषा क्या है:

वे यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते है परन्तु उसमे उपस्थित समूहों की व्यवस्था भिन्न भिन्न होती है , जिससे उनके गुण भी भिन्न भिन्न होते है।  वे एक दूसरे के समावयवी कहलाते है इस गुण को समावयवता कहते है।

समावयवता का वर्गीकरण :

  1. सरंचना समावयवता
  2. त्रिविम समावयवता

सरंचना समावयवता:

  1. आयनन
  2. बंधनी
  3. उपसहसंयोजन
  4. विलायक योजन या हाइड्रेट

संरचना समावयवता को विस्तार में पढ़ते है |

यह चार प्रकार की होती है

1.आयनन समावयवता :

वे संकुल यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते है परन्तु जलीय विलयन में अलग अलग आयन देते है उनमे आयनन समावयवता पाई जाती है।

उदाहरण :

[CO(NH3)5Cl]SO4  ⇆ [CO(NH3)5Cl]2+  + SO42-

[CO(NH3)5SO4]Cl  ⇆  [CO(NH3)5SO4]+  + Cl–

प्रथम यौगिक के जलीय विलयन में BaCl2का विलयन मिलाने पर BaSO4 का स्वेत अवक्षेप बनता है , जिससे विलयन में सल्फेट (SO4) आयन की पुष्टि होती है।

दूसरे यौगिक के जलीय विलयन में AgNO3 मिलाने पर AgCl का स्वेत अवक्षेप बनता है , जिससे क्लोराइड (Cl) आयन की उपस्थिति सिद्ध होती है।

2. बंधनी समावयवता :

वे यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते है परन्तु उनमे उभयदंती लिगेंड के दाता परमाणु भिन्न भिन्न होते है , उनमे बंधनी समायवता पायी जाती है।

उदाहरण :

[CO(NH3)5(NO2)]Cl2

[CO(NH3)5(ONO)]Cl2

3. उपसहसंयोजन समायवता :

यह समायवता उन संकुल यौगिकों में पायी जाती है जिनका धनायन व ऋणायन दोनों ही संकुल आयन हो इन संकुल आयनों में लिगेंड के आदान प्रदान से यह समायवता बनती है।

उदाहरण :

[CO(NH3)6][Cr(CN)6]

[Cr(NH3)6][CO(CN)6]

4. विलायक योजन समायवता या हाइड्रेट समायवता :

वे संकुल यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते है परन्तु एक समावयवी में जल के अणु लिगेंड के रूप में तो दूसरे समावयवी में कुछ जल के अणु क्रिस्टलीन जल में होते है।

त्रिविम समायवता :

  1. ज्यामिति
  2. घूर्णन या प्रकाशिकी

 त्रिविम समावयवता किसे कहते है :

वे यौगिक जिनके अणुसूत्र समान होते है परन्तु उनमे परमाणु अथवा समूहों की आकाशीय व्यवस्था भिन्न भिन्न होती है वे एक दूसरे के त्रिविम समावयवी कहलाते है , इस गुण को त्रिविम समावयवता कहते है।

यह समावयवता दो प्रकार की होती है।

1. ज्यामिति समावयवता :

उपसहसंयोजन संख्या चार वाले संकुल यौगिक जिनकी ज्यामिति सतलीय वर्गाकार है उनमे ज्यामिति समायवता।

उदाहरण :

[Pt(NH3)2Cl]

[Pt(NH3)2ClBr]

2. प्रकाशिक समावयवता या ध्रुवण समावयवता :

वे यौगिक जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को किसी विशेष दिशा में घुमा देते है उन्हें ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहते है।

यदि वह यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं ओर घुमाता है तो उसे दक्षिण ध्रुवण घूर्णक पदार्थ कहते है इसे d या + से व्यक्त करते है।

यदि वह पदार्थ समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बायीं ओर घुमाता है तो उसे वाम ध्रुवण घूर्णक पदार्थ कहते है इसे l या – चिन्ह से व्यक्त करते है।

ध्रुवण समायवता के लिए आवश्यक शर्ते निम्न है।

  1. अणुअसममित होना चाहिए।
  2. अणु अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होना चाहिए ऐसे अणुओं काइरल अणु कहते है।

उदाहरण : [CO(CN)3]3+

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