Mendal Ka Niyam

मेंडल के नियम – Mendal Ka Niyam

Mendal Ka Niyam:मेण्डल के नियम परीक्षा के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण टॉपिक है. अक्सर मेण्डल के नियम से सम्बंधित प्रश्न जैसे कि मेण्डल के नियम के प्रकार आदि  प्रैक्टिकल परीक्षा के दौरान प्रश्न पूछे जाते है. अतः परीक्षार्थियों को मेण्डल के नियम से जुड़े सभी सम्बंधित प्रश्नों का भलीभांति तैयार कर लेना चाहिए.

Mendal Ka Niyam

मेण्डल ने मटर पर किए संकरण प्रयोगों के निष्कर्षों के आधार पर कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जिन्हें मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम कहा जाता है। इन्हें मेण्डलवाद के नाम से जाना जाता है। आनुवंशिकता के क्षेत्र में इन सिद्धान्तों के प्रतिपादन करने के लिए ही मेण्डल को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता है। ये निम्न है –

1.प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

जब मेंडल ने विपर्यासी अर्थात् भिन्न-भिन्न लक्षणों वाले समयुग्मजी पादपों में जब संकर संकरण करवाया तो इस क्राॅस में मेण्डल ने एक ही लक्षण प्रदर्शित करने वाले पादपों का ही अध्ययन किया। तो उसने पाया कि एक प्रभावी लक्षण अपने आप को अभिव्यक्त करता है और एक अप्रभावी लक्षण अपने आप को छिपा लेता है। इसी को प्रभाविता कहा गया है। और इस नियम को मेण्डल का प्रभाविता का नियम कहा जाता है।

जैसे – जब प्रभावी (dominant) red (RR) का क्रॉस अप्रभावी (Recessive) सफेद (rr) के साथ कराया तो प्रथम पीढ़ी में प्रभावी (Rr) लक्षण दिखाई देंगे दिए। जब प्रभावी Rr का self cross कराया गया तो अगली पीढ़ी में यह एक दूसरे को बिना दूषित किए हुए पृथक हो गए।

2.पृथक्करण का नियम या विसंयोजन का नियम या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation or Law of Purity of Gametes)

युग्मक निर्माण के समय दोनों युग्म विकल्पी अलग हो जाते हैं अर्थात् एक युग्मक में सिर्फ एक विकल्पी जाता है। इसीलिए इसे पृथक्करण का नियम कहते है। युग्मक किसी भी लक्षण के लिए शुद्ध होते है।

3.स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

यह नियम द्विसंकर संकरण के परिणामों पर आधारित है। इस नियम के अनुसार ‘‘किसी द्विसंकर संकरण में एक लक्षण की वंशागति दूसरे लक्षण की वंशागति से पूर्णतः स्वतंत्र होती है। अर्थात् एक लक्षण के युग्मविकल्पी दूसरे लक्षण के युग्मविकल्पी से युग्मक निर्माण के समय स्वतंत्र रूप से पृथक व पुनव्र्यवस्थित होते हैं।’’

इसमें लक्षण प्ररूप अनुपात 9 : 3 : 3 : 1 होता है।मेण्डल का यह नियम Dihybrid cross पर आधारित है। इस नियम के अनुसार जब मेण्डल ने दो जोड़े विपरीत अनुवांशिक लक्षणों के बीच में cross कराया तो प्रथम पीढ़ी में प्रभावी लक्षण दिखाई दिए। यह लक्षण एक दूसरे को बिना दूषित किए हुए पृथक हो गए। अगली पीढ़ी में इनका self cross कराने पर यह एक दूसरे से पूरी तरह से स्वतंत्र हो गए। इसे ही स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम कहते हैं।

जैसे – जब इन्होंने दो शुद्ध नस्ली P पौधों में संकरण किया जिनमें से एक में पीढ़ी-दर पीढ़ी पीले बीजपत्रों (cotyledons) वाले गोल (round) बीज (मटर के दाने) बनते थे तथा दूसरे में हरे बीजपत्रों वाले झुर्रीदार (wrinkled) बीज।  प्रबलता के नियम द्वारा उन्हें यह पहले से ही पता था कि बीजों की गोल आकृति झुर्रीदार आकृति के लिए प्रबल (dominant) होती है तथा बीजपत्रों का पीला रंग हरे रंग के लिए। अतः जब इन्होंने P पौधे के बीच में cross कराया तो F1 पीढ़ी के सारे पौधों (द्विगुण संकर पौधों – dihybrids) में स्वपरागण द्वारा पीले बीजपत्रों वाले गोल बीज बने।

उन्होंने इन बीजों को एकत्र किया तथा इन्हें अलग स्थान पर बोकर F2 पीढ़ी के पौधे उगाए। इन पौधों में भी उन्होंने स्वपरागण होने दिया और देखा कि इनमें से 315 पौधों में पीले बीजपत्रों वाले गोल बीज, 108 में हरे बीजपत्रों वाले गोल बीज, 101 में पीले बीजपत्रों वाले झुर्रीदार बीज तथा 32 में हरे बीजपत्रों वाले झुर्रीदार बीज बने। स्पष्ट है कि इन चार प्रकार के पौधों की संख्या में क्रमशः लगभग 9 : 3 : 3 : 1 का अनुपात रहा

credit:Biology ScienceSK

आर्टिकल में आपने मेण्डल के नियम को पढ़ा। हमे उम्मीद है कि ऊपर दी गयी जानकारी आपको आवश्य पसंद आई होगी। इसी तरह की जानकारी अपने दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करे ।

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